इस्लाम जीवन और मृत्यु को कैसे देखता है?
इस्लाम आपसे मौत से डरने के लिए नहीं कहता...
बल्कि ऐसी ज़िंदगी जीने के लिए कहता है जो आपके ख़ालिक़ (सृष्टिकर्ता) को राज़ी करे और आपके बाद एक अच्छा निशान (असर) छोड़ जाए।
क्योंकि मौत इंसान की कहानी का अंत नहीं, बल्कि उसका सिलसिला (निरंतरता) है।
आपकी असली ज़िंदगी तब शुरू होती है जब आप जान लेते हैं कि आपको क्यों बनाया गया।
और मक़सद यह है कि आप अल्लाह से मिलें जबकि आप सही रास्ता जान चुके हों। और जब आप यह समझ जाते हैं कि ज़िंदगी एक छोटी परीक्षा है, तो आप महसूस करते हैं कि मौत अंत नहीं है... बल्कि यह उस (परमशक्ति) से मुलाकात है जिसने आपको हक़ (सत्य) के साथ पैदा किया।
अल्लाह तआला फरमाते हैं:{ जिसने मृत्यु तथा जीवन को पैदा किया, ताकि तुम्हारा परीक्षण करे कि तुम में किसका कर्म अधिक अच्छा है} [अल्-मुल्क: 67:2]
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