आत्म-विरोधी नैतिक सापेक्षवाद (Self-Refuting Moral Relativism)
नैतिक सापेक्षवाद के सामने सबसे बड़ा तार्किक संकट यह है कि वह स्वयं अपने कथन से ही टूट जाता है।
1. आत्म-विरोध का तर्क सापेक्षवाद कहता है: कोई पूर्ण नैतिक सत्य नहीं है सभी मूल्य और निर्णय सापेक्ष हैं हर सत्य संस्कृति या व्यक्ति पर निर्भर है लेकिन यह कथन स्वयं कैसे प्रस्तुत किया जाता है? इसे एक सार्वभौमिक सत्य की तरह कहा जाता है, जो सब पर लागू हो। यदि यह कथन पूर्ण सत्य है, तो कम से कम एक पूर्ण सत्य मौजूद है — और सापेक्षवाद गलत हो गया।
यदि यह केवल एक राय है, तो फिर किसी पर इसे मानना आवश्यक नहीं। इस प्रकार सापेक्षवाद या तो स्वयं को नष्ट करता है, या महत्वहीन राय बन जाता है।
2. सहिष्णुता का विरोधाभास (Paradox of Tolerance) सापेक्षवादी अक्सर कहते हैं कि उनका विचार लोगों को सहिष्णु बनाता है। लेकिन प्रश्न है: यदि सब मूल्य सापेक्ष हैं, तो सहिष्णुता क्यों अच्छी है? यदि सहिष्णुता सब पर लागू होने वाला सिद्धांत है, तो यह एक सार्वभौमिक नैतिक सत्य बन गया — और सापेक्षवाद समाप्त।
यदि सहिष्णुता भी केवल एक संस्कृति की पसंद है, तो फिर किसी असहिष्णु समाज की आलोचना नहीं की जा सकती। तब नस्लवाद, अत्याचार या घृणा को भी केवल “दूसरी राय” कहना पड़ेगा।
3. अन्याय की निंदा असंभव हो जाती है यदि कोई पूर्ण नैतिक सत्य नहीं है, तो इतिहास के बड़े अपराधों की वस्तुनिष्ठ निंदा कैसे होगी? जैसे: नरसंहार गुलामी जातीय सफाया अत्याचार बलात्कार शोषण सापेक्षवाद के अनुसार अत्याचारी कह सकता है: “यह मेरी संस्कृति है” “यह मेरी शक्ति है” “यह मेरा मूल्य है” फिर कोई उसे “वास्तविक बुराई” नहीं कह सकता।
“केवल इतना कह सकता है: “मुझे यह पसंद नहीं।” यानी अन्याय और स्वाद में अंतर मिट जाता है।