निर्णायक तार्किक दलीलें और बुद्धिसंगत प्र
आलोचना को और मजबूत बनाने के लिए, इस्लामी कलाम और औपचारिक तर्कशास्त्र की पद्धति के अनुसार नास्तिक विचारधारा की कमजोरियों को स्पष्ट तार्किक रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। इससे उनके दावों के भीतर का विरोधाभास साफ़ दिखाई देता है।
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नैतिक सापेक्षवाद के खंडन की तार्किक दलील (Modus Tollens के रूप में) बड़ी प्रस्तावना: यदि नैतिकता पूरी तरह सापेक्ष हो — अर्थात केवल व्यक्ति की राय या समाज की बदलती सहमति पर निर्भर हो — तो फिर किसी भी कर्म को पूर्ण नैतिक अपराध नहीं कहा जा सकता, चाहे वह कितना ही घृणित क्यों न हो, जैसे: नरसंहार गुलामी बच्चों पर अत्याचार क्योंकि हर कर्म को कोई न कोई “सापेक्ष” औचित्य मिल जाएगा।
छोटी प्रस्तावना: लेकिन बुद्धि, फ़ितरत और सामान्य मानवीय समझ से यह स्पष्ट है कि इन अपराधों की निंदा करना न केवल संभव है, बल्कि आवश्यक है। इन्हें हर युग और हर स्थान में वास्तविक अन्याय माना जाता है। निष्कर्ष: अतः नैतिकता पूरी तरह सापेक्ष नहीं हो सकती। निश्चित ही कुछ स्थायी, वस्तुनिष्ठ नैतिक सत्य मौजूद हैं।
और चूँकि ये नैतिक सत्य स्वयं शून्य से उत्पन्न नहीं हो सकते, न ही अंधे पदार्थ से निकल सकते हैं, इसलिए आवश्यक है कि उनका एक सर्वोच्च, पूर्ण, ज्ञानवान और न्यायकारी स्रोत हो — और वह है अल्लाह।
“3. अर्थ और उद्देश्य के संकट पर तार्किक दलील बड़ी प्रस्तावना: यदि ब्रह्मांड बिना किसी उद्देश्य, बिना किसी सृष्टिकर्ता और बिना किसी अंतिम लक्ष्य के अस्तित्व में आया, और अंततः पूर्ण विनाश और शून्यता की ओर जा रहा है, तो फिर हर मानवीय प्रयास अंततः निरर्थक और व्यर्थ होगा।