दाऊद का मूर्तियों पर व्यंग्य: हर चिंतनशील मन के लिए एक संदेश
आइए पूर्वधारणाओं से परे जाकर नबियों के अपने शब्दों को देखें। क्या उन्होंने संयुक्त देवता की कल्पना की, या शुद्ध एकेश्वरवाद ही उनके विश्वास और जीवन का आधार था?
❖ नबी और एकत्व की घोषणा
प्रोफेसर मुहम्मद माजिदी मरजान अपनी पुस्तक God Is One or Trinity (पृष्ठ 128) में लिखते हैं:
“तौरात के अध्ययन में हमें कोई याजक त्रित्व की बात करता नहीं मिलता, न कोई नबी बहुलता की ओर संकेत करता है। बल्कि सभी नबी ईश्वर की एकता की घोषणा करते हैं—कि उसका न कोई साझीदार है, न कोई संरचना, न कोई समान।”
नहेमायाह कहते हैं:
““ताकि पृथ्वी के सब राज्य जान लें कि तू ही यहोवा परमेश्वर है, केवल तू ही।” (2 राजा 19:19)
एकेश्वरवाद स्थानीय विचार नहीं था बल्कि समस्त मानवता के लिए उद्घोषणा था।
❖ क़ुरआन से तुलना
“आकाशों और धरती और जो कुछ उनके बीच है उसका पालनहार वही है, अतः उसी की उपासना करो और उसकी उपासना में धैर्य रखो। क्या तुम उसके समान किसी को जानते हो?” (क़ुरआन 19:65)
जैसा कि नबियों ने कहा, ईश्वर एक है, सृष्टिकर्ता है, उसका कोई साझीदार नहीं।
❖ शांत प्रश्न
क्या संयुक्त या बहु-ईश्वर की कल्पना तर्कसंगत है?
क्या कोई बाद की परंपरा उस ईश्वर में साझीदार जोड़ सकती है जिसकी घोषणा सभी नबियों ने की?
पाठों को बोलने दें और बुद्धि को विचार करने दें।
❖ खुला निष्कर्ष
नहेमायाह से मलाकी तक, यिर्मयाह से अय्यूब और राजाओं तक—एक ही केंद्र है: ईश्वर की शुद्ध एकता।
संपूर्ण ब्रह्मांड इसकी गवाही देता है। सृष्टि इसका प्रमाण है।
शायद ईश्वर को समझने का मार्ग हमारे विचार से अधिक निकट है—नबियों के उन्हीं शब्दों में।
क्या हम उन शब्दों को बिना सोचे आगे बढ़ा देंगे, या खुले मन से पढ़कर ईश्वर की एकता को सभी दिव्य संदेशों का केंद्र मानेंगे?