निहिलिज़्म और अर्थ का संकट (The Crisis of Meaning)
आधुनिक नास्तिक विचारधारा जीवन के अर्थ के प्रश्न से गहराई से जूझती है, लेकिन शुद्ध भौतिकवाद और नैतिक सापेक्षवाद इस प्रश्न का ठोस उत्तर नहीं दे पाते।
1. यदि ब्रह्मांड उदासीन है यदि ब्रह्मांड: हमें कोई महत्व नहीं देता केवल अंधे भौतिक नियमों से चल रहा है संयोग का परिणाम है किसी उद्देश्य के बिना है तो फिर मनुष्य का अस्तित्व क्या है? इस दृष्टिकोण में जीवन केवल थोड़े समय की जैविक घटना बन जाता है।
2. यदि मृत्यु अंत है यदि मृत्यु के बाद: कोई हिसाब नहीं कोई न्याय नहीं कोई प्रतिफल नहीं कोई स्थायी जीवन नहीं तो फिर: अच्छाई क्यों? बलिदान क्यों? सत्य पर टिके रहना क्यों? अन्याय सहकर न्याय चुनना क्यों? यदि अंत शून्य है, तो सब प्रयास अंततः मिट जाते हैं।
“4. गहरी मानवीय आवश्यकता मनुष्य स्वभावतः पूछता है: मैं क्यों हूँ? न्याय कहाँ मिलेगा? सत्य क्या है? मृत्यु के बाद क्या है? क्या मेरे जीवन का उद्देश्य है? ये प्रश्न केवल रोटी, धन और मनोरंजन से शांत नहीं होते।