जो चीज़ समाज को बचाती है → अच्छा
जो उसे नुकसान पहुँचाती है → बुरा
इस तरह:
नैतिकता = बदलती हुई परंपरा
लेकिन यहाँ एक समस्या है…
अगर नैतिकता पूरी तरह सापेक्ष है:
तो हम कैसे कहेंगे:
गुलामी गलत थी?
क्या यह सिर्फ “पुराने समय में स्वीकार्य” थी?
क्या हम नाज़ीवाद को पूर्ण बुराई कह सकते हैं?
या बस “एक अलग मूल्य प्रणाली”?
अगर सब सापेक्ष है—
तो “वास्तविक अन्याय” जैसी कोई चीज़ नहीं रहती
हम सिर्फ कह सकते हैं:
“मुझे पसंद नहीं”
और यह बहुत बड़ा अंतर है
जब हम अन्याय देखते हैं—
हम सिर्फ नापसंद नहीं करते
हम कहते हैं:
“यह नहीं होना चाहिए”
यह “चाहिए” क्या है?
यह एक उच्च मानक की ओर इशारा करता है
जो हमारी पसंद से ऊपर है
लेकिन:
एक शुद्ध भौतिक दुनिया में
यह “चाहिए” कहाँ से आया?
पदार्थ आदेश नहीं देता
कण नैतिक नियम नहीं बनाते