आपत्तियाँ और उनके उत्तर (मुख्य शंकाएँ)
पहली आपत्ति: क्या इस्लाम भी दुनिया से विरक्ति (ज़ुह्द) की बात नहीं करता? फिर हमारे ज़ुह्द और निर्वाण में क्या अंतर है? यह आपत्ति दुनिया को छोड़ने के उद्देश्य को समझने में भ्रम पर आधारित है। इस्लाम यह नहीं कहता कि दुनिया को पूरी तरह त्याग दिया जाए, बल्कि यह सिखाता है कि दुनिया को अंतिम लक्ष्य न बनाया जाए, जिसके लिए अल्लाह की अवज्ञा की जाए।
साथ ही, इस्लाम दुनिया को "आख़िरत की खेती" और कर्म की परीक्षा का मैदान मानता है। अल्लाह तआला कहते हैं: ﴿ और उसने तुम्हारे लिए जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है सबको अपनी ओर से वश में कर रखा है।
नि﴾ [अल-जासिया: 13] इस्लाम में हम दुनिया से इसलिए विरक्ति रखते हैं कि हम अपने दिल को अल्लाह से जोड़ें, और अपने सांसारिक कार्यों को भी नीयत के माध्यम से इबादत बना दें। जबकि निर्वाण में दुनिया से विरक्ति स्वयं एक अंतिम लक्ष्य है, जो शून्यता और आंतरिक समाप्ति की ओर ले जाती है।
दूसरी आपत्ति: क्या इच्छाओं को पूरी तरह समाप्त कर देना संघर्ष से बेहतर और अधिक शांतिपूर्ण नहीं है? इच्छाओं का पूर्ण उन्मूलन वास्तव में मानव जीवन की मूल संरचना को समाप्त करना है।
इस्लाम में इच्छाओं के साथ संघर्ष (मुझाहदा) ही परीक्षा का आधार है, और यही वह प्रक्रिया है जो मनुष्य को उच्च स्तर तक उठाती है—यहाँ तक कि फ़रिश्तों से भी ऊपर, क्योंकि वे बिना इच्छा के ही आज्ञाकारी हैं। नबी ﷺ ने कहा: "सच्चा मुजाहिद वह है जो अल्लाह की आज्ञा में अपने नफ़्स से संघर्ष करे।
“चौथी आपत्ति: यदि यह नैतिकता, शांति और अहिंसा की शिक्षा देती है, तो इसे गलत क्यों माना जाए? इस्लाम में किसी विचारधारा की सत्यता केवल उसके नैतिक व्यवहारों पर आधारित नहीं होती। कुछ नैतिक गुणों का सही होना, पूरे आस्थागत ढाँचे को सही नहीं बना देता।