क्या यह पुस्तक अल्लाह के अलावा किसी और की हो सकती है?

दुनिया में जहाँ अनेक धर्म, पुस्तकें और सिद्धांत मौजूद हैं, हर सत्य-खोजी इंसान के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है: मैं कैसे जानूँ कि यह पुस्तक सच है? क्या इसका स्रोत वास्तव में दिव्य है? सदियों से लाखों लोगों ने इस प्रश्न का उत्तर एक ही पुस्तक में पाया है — क़ुरआन। लेकिन क्यों?

1. समय से अछूता ग्रंथ हर मानवीय पुस्तक समय के साथ बदलती है। लेकिन क़ुरआन एक अपवाद है। क़ुरआन कहता है: “निस्संदेह हमने ही इस स्मरण (क़ुरआन) को उतारा है और हम ही इसके संरक्षक हैं।” (सूरह अल-हिज्र 15:9) यह पुस्तक: लिखी भी गई याद भी की गई और पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित रही।

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आज दुनिया में जहाँ भी क़ुरआन है — मोरक्को से भारत तक — हर प्रति अक्षर-अक्षर समान है। इतिहास में ऐसा कोई दूसरा ग्रंथ नहीं मिलता।

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2. उसकी शैली — जिसे कोई दोहरा नहीं सका क़ुरआन की भाषा किसी भी ज्ञात साहित्यिक शैली से अलग है। न कविता न गद्य न भाषण बल्कि एक अनोखी शैली। इसीलिए क़ुरआन ने चुनौती दी: “यदि तुम कहते हो कि यह मनगढ़ंत है, तो इसके जैसी एक सूरह ले आओ।” (सूरह यूनुस 10:38) 1400 वर्षों में कोई भी इस चुनौती को पूरा नहीं कर सका।

3. ऐसी जानकारी जो उस समय संभव नहीं थी क़ुरआन एक साधारण रेगिस्तानी समाज में उतरा। फिर भी उसमें ऐसी बातें हैं जिन्हें विज्ञान ने बाद में खोजा: जीवन का स्रोत पानी भ्रूण विकास के चरण ब्रह्मांड का विस्तार उदाहरण: “और हमने हर जीवित चीज़ को पानी से बनाया।” (क़ुरआन 21:30) ऐसी जानकारी उस समय उपलब्ध नहीं थी।

4. 23 वर्षों में अवतरित ग्रंथ — लेकिन बिना विरोधाभास यदि कोई इंसान 23 वर्षों तक एक पुस्तक लिखे, तो उसमें शैली बदल जाएगी, विचार बदलेंगे। लेकिन क़ुरआन में ऐसा नहीं है। वह युद्ध में भी उतरा शांति में भी मक्का में भी मदीना में भी फिर भी उसका संदेश एक ही है। क़ुरआन कहता है: “यदि यह अल्लाह के अलावा किसी और की ओर से होता, तो इसमें बहुत विरोधाभास पाते।

निष्कर्ष जब हम सभी तथ्यों को एक साथ देखते हैं: पूर्ण संरक्षण अद्वितीय शैली वैज्ञानिक संकेत पूरी तरह संगत संदेश गहरा आध्यात्मिक प्रभाव तो प्रश्न फिर उठता है: क्या यह संभव है कि यह पुस्तक अल्लाह के अलावा किसी और की हो?

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